देश मैं होने वाले आगामी चुनावो के लिए सभी राजनितिक दलों ने तयारी शुरू कर दी है , देश की राजधानी होने के कारन डेल्ही मैं होने वालो चुनावो पर सभी का ध्यान लगा रहता है । कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा मैं सिलान्यासों पर जो जनता के गाड़ी कमाई लुटाई जा रही है शायद उस ओअर किसी का ध्यान नहीं है विडम्बना तो यह है की एक ही कार्य का सिलान्य्सा कई कई नेता कर रहे है । वास्तव मैं वोट बैंक की राजनीती ने देश मैं लोकतंतर के मायने बदल्दिये है ओर कभी अपनी लोकतान्त्रिक छवि के लिए देश मैं मशहूर भारत मैं लोकतंत्र का खुल्लाम्खुल्ला मजाक बनाया जा रहा है।
देश का एक सम्भंत वर्ग ऐसा है जो पुरे ५ वर्ष तो सरकार को कोसता रहता है लेकिन जबवोट सालने का समय आता है तो उस समय यह सम्भंता वर्ग स्वयम को लम्बी कतारों मैं नहीं देखना चाहता। यह अपने मैं विरोधाभास है और यह देखकर दुका भी होता है की देश नेताओ की हरकतों से लगातार रसातल की ओअर जा रहा है।
देश मैं एलिट क्लास व् मध्यम क्लास के बिच की लडाई लागतात काहुदिहोती जा रही है, देश मैं आज भाई २५ करोड़ से अधिक लोग भूखे सोते हैं, देश मैं ३० करोड़ बरोजगारों की फौज खड़ी हो चुकी है , कोसी का कहा और किसानो की लगातार कर्ज मैं दबे होने के कारन आत्महत्या करना आलकल किसी अख़बार या चैनल की ख़बर नहीं है। आखिर क्यूँ हम इतने निष्ठुर हो गए है की हमारे जनप्रतिनिधि से लेकर आम जनमानस भी अपने हितों की लडाई लड़ने मैं स्वयम को अपमानित समझता है
समय आ चुका है की अब देश के नाटो से हिसाब माँगा जाए और सशक्त भारत के निर्माण की दिशा मैं गंभीर प्रयास किए जायें
Monday, October 13, 2008
आदरणीय , सम्मनित भारत देश नागरिको, सभी भारतवासी, भाइयों आज देश मैं एक ऐसी बहस छिडी हुई है जिस पर देश के एक जिम्मेदार नागरिक होते हुए आपकी अभिव्यक्ति जरुरी है । पुरे विश्व मैं शान्ति, सोहार्दा व् भाईचारे के लिए जाने वाला देश आज दंगो मैं जल रहा है। पुरे देश के भीतर एक ऐसा अनिश्चितिता का वातावरण बन गया है की मानो ऐसा लगता है कि इस देश मैं लोकतंत्र हो ही न । सम्मानित देशवासियो और प्रबुद्ध नागरिको आज़ादी के साठ वर्ष बीत चुके हैं । इन साठ वर्षों मैं देश को कमज़ोर करने के लिए पड़ोसी मुल्को द्वारा अनके कोशिशें हुई , लेकिन भारत माता के सच्चे सपूतों ने देश कि खातिर अपने प्राणों कि बजी लगा दी। मैं यह मानता हूँ कि भारत कि आज़ादी के बाद से देश मैं सांप्रदायिक सोहादा मैं कमी आई है , इसी भारत मां कि लाज रखने के लिए चंद्रशेखर आजाद , बिस्मिल्लाह खान और भगत सिंघ जैसे वीरो ने जान देना स्वीकार कर लिया लेकिन देश भक्ति के जज्बे से विमुख नहीं हुए । इस बात का उल्लेख यहाँ पर इसलिए किया कि आज़ादी से पहले हमारा केवल एक धर्म था , भारत माँ कि शान बांये रखना । लेकिन आज देश मैं देश के ही भीतर दहशतगर्दो कि एक ऐसी फौज खड़ी हो गई है कि इसने देश कि अस्मिता और भाईचारे को खाक मैं मिला दिया है । मुझे ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं घर से मिलने वाले संस्कारो मैं , स्कूल से मिलने वाली सिक्षा मैं , बड़े बुजुर्गो से मिलने वाली सलाह व् अनुभवों मैं कहीं न कहीं कोई कमी जरूर रह गई है जिसे आज के ये नौनिहाल आंतकवाद के रास्ते पर जाने को विवश हुए हैं। अन्यथा आज जो कुछ कंधमाल मैं , असम मैं , डेल्ही मैं और देश के अन्य भागो मैं दहशतगर्द कर्वैइयें हो रही है वेः कभी नहीं होती ।
आज जब सारा विश्व भारत कि बढती ताकत से चकित है और अन्य देश भारत कि ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं ऐसी इस्थी मैं मेरा मन्ना है कि जब तक देश मैं चाहे वे किसी भी मजहब के हों घर से संस्कार मिलने जरुरी हैं । और इसमे माता पिता, गुरुजनों और समाज के प्रबुद्ध नागरिकों का प्रयत्न आवश्यक है ,। इस अवसर पर कुछ पंक्तियाँ ययद आ रही है मजहब नहीं सिखाता आपस मैं बैर रखना ।
अंत मैं देश कि अमन और खुशाली कि दुआ के साथ,,, क्रमशः
पवन कुमार
आज जब सारा विश्व भारत कि बढती ताकत से चकित है और अन्य देश भारत कि ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं ऐसी इस्थी मैं मेरा मन्ना है कि जब तक देश मैं चाहे वे किसी भी मजहब के हों घर से संस्कार मिलने जरुरी हैं । और इसमे माता पिता, गुरुजनों और समाज के प्रबुद्ध नागरिकों का प्रयत्न आवश्यक है ,। इस अवसर पर कुछ पंक्तियाँ ययद आ रही है मजहब नहीं सिखाता आपस मैं बैर रखना ।
अंत मैं देश कि अमन और खुशाली कि दुआ के साथ,,, क्रमशः
पवन कुमार
Subscribe to:
Posts (Atom)


